Vrindavan Ras Charcha

श्री हित रूपलाल गोस्वामी जी महाराज की दिव्य जीवनी

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श्री हित रूपलाल गोस्वामी जी का जन्म

श्री हित हरिवंश जी महाराज के परमपावन कुल में वैशाख कृष्ण सप्तमी, संवत 1738 (1681 ई.) को गोस्वामी श्री हित रूपलाल जी महाराज का जन्म हुआ। पिता का नाम श्री हरिलाल जी और माता श्री कृष्णकुँवरी जी था। जन्म से ही इनकी वृत्ति श्रीराधावल्लभ प्रेम में रमी हुई थी।

बाल्यकाल – बाल-हठ से दर्शन

उस समय यवनों का आक्रमण सर्वत्र था, अतः श्रीराधावल्लभलाल जी को अजानगढ़ (कामवन के समीप) में छिपाकर रखा गया था। श्रावण मास में जब वहाँ बाढ़ आई, उसी समय बालक हित रूपलाल जी ने अचानक श्री राधावल्लभ जी के दर्शन की हठ पकड़ ली। पिता को विवश होकर उन्हें बाढ़ के बीच अजानगढ़ ले जाना पड़ा।

वहाँ पहुँचते ही बालक श्री हित रूपलाल जी प्रेम-समाधि में चले गए और श्रीमन्दिर की ओर बढ़े। बिना दीक्षा और स्नान के मंदिर में प्रवेश वर्जित था, समझाने पर बालक ने यमुना में कूदकर कहा – “स्नान मैं कर लेता हूँ!”


इस अद्भुत श्रद्धा और साहस को देख पिता ने स्वयं संक्षिप्त दीक्षा देकर उन्हें मंदिर में प्रवेश कराया। वहाँ जाकर वे श्री राधावल्लभ जी के चरणों से लिपट गए और प्रेमाश्रुओं से चरण प्रक्षालन करने लगे।

मतवाले हाथी का चरणस्पर्श

बरसाना के संकरी खोर में एक दिन जब पालकी में यात्रा हो रही थी, एक मतवाला हाथी दौड़ता हुआ उनकी ओर आया। सभी रक्षक और कहार भयभीत होकर भाग गए। पर वह हाथी पालकी के पास आया और श्री हित रूपलाल जी के चरणों को सूँड से छूकर शांत हो गया। इस लीला को देखकर सभी ने उन्हें दिव्य पुरुष मान लिया।

श्री हित रूपलाल गोस्वामी जी की शिक्षा और विवाह

बाल्यकाल से ही भक्ति के संस्कार प्रबल थे। वे स्वयं रास-मंडल की सोहनी बुहारते और उल्लास से सेवा करते। विद्याध्ययन और विवाह के पश्चात लगभग 20 वर्ष की आयु से वे भ्रमण द्वारा भक्ति का प्रचार करने लगे।

Shri hita roop Lal goswami Ji maharaj

विधि-विधान और राजा से मतभेद

ब्रज के पंडितों ने उनसे प्रश्न किया – “आप संध्या आदि कर्म क्यों नहीं करते?”
उत्तर मिला –
“प्रातःकाल का समय मंगला आरती का है, मध्यान्ह राजभोग सेवा का, और सायं उत्थापन का। हम सेवा छोड़कर संध्या कैसे करें?”

यह उत्तर सुन पंडितगण लज्जित हुए, परंतु उन्होंने राजा जयसिंह से चुगली कर दी। राजा ने श्री हित रूपलाल जी से वैदिक कर्म करने का आग्रह किया, पर उन्होंने सेवा में विघ्न मानकर इनकार कर दिया। राजा ने क्रोधित होकर उनकी सम्पत्ति हर ली।

तब वे श्रीराधावल्लभ जी को लेकर रोहतक चले गए, जहाँ के राजा ने उनका सम्मानपूर्वक स्वागत किया और कामवन में मंदिर बनवाकर उन्हें वहीं निवास कराया।

वृषभानु मंदिर का निर्माण

उनके शिष्य सेवा सखी जी ने गौंडा के राजा से एक लाख रुपया प्राप्त कर के बरसाना में श्री वृषभानु जी का भव्य मंदिर बनवाया और श्री राधाष्टमी का उत्सव वहाँ स्थापित किया। यह मंदिर आज भी उसी सेवा-परंपरा में स्थित है।

तीर्थ यात्राएँ

गुजरात यात्रा में श्रीरामकृष्ण मेहता की भक्ति से प्रसन्न होकर उनके घर आठ माह रहे और उन्हें श्रीराधाकृष्ण के प्रत्यक्ष दर्शन कराए।

गोविंदकुंड में छह महीने तक गिरिराज शिला की आराधना की। उस शिला से श्रीयुगलकिशोर का श्रीविग्रह प्रकट हुआ, जो अब राधाकुंड में विराजमान हैं।

प्रयाग में एक महात्मा ने सिद्धि प्राप्त नारियल उन्हें दिया, पर उन्होंने लौटा दिया –
“श्रीकृष्ण कृपा चाहने वाले के लिए सिद्धियाँ व्यर्थ हैं।”

चमत्कार – रोग का निवारण

आगरा में शिष्य वैष्णव दयालदास की पुत्री विष्णीबाई का असाध्य रोग उन्होंने अपनी कृपा से दूर किया।

Shri hita roop Lal goswami Ji maharaj

बरसाना में श्रीराधारानी का दर्शन

जब वे बरसाना पहुँचे, श्री किशोरी जी ने उनके भाव से प्रसन्न होकर प्रत्यक्ष दर्शन दिए। यह लीला आज भी भक्तों को भावविभोर कर देती है।

ग्रंथ रचना

उन्होंने राधावल्लभीय परंपरा में अनेक ग्रंथों की रचना की, जिनमें प्रमुख हैं:

  • प्रथम विजय चौरासी

  • द्वितीय विजय चौरासी

  • अष्टयाम सेवा प्रबन्ध

  • मानसी सेवा प्रबन्ध

  • नित्यविहार,

  • गूढ़-ध्यान,

  • ब्रज-भक्ति,

  • वाणीविलास

  • साँझी लीला

आदि की रसवर्णना का श्रेय भी उन्हें ही जाता है।

शिष्य परंपरा

उनके प्रमुख शिष्यों में लालमुरलीधर, कस्तूरीबाई, वृंदावनदास जी, सेवा सखी जी, भानसखी, किशोरीदास जी आदि प्रमुख हैं।

श्री हित रूपलाल गोस्वामी जी का निकुंज प्रवेश

श्री हित रूपलाल जी ने अपने जीवन के अंतिम समय में बरसाना में वास किया और संवत 1818 (1750 ई.) में निकुंज प्रवेश कर युगल सेवा में लीन हो गए।

वृन्दावन रास चर्चा

Jai Jai Shree Radhe Shyam!

ब्रज के रसिक संत मानते हैं कि दिव्य आनंद श्रीधाम वृंदावन में है। यह वेबसाइट राधा कृष्ण की भक्ति में इस आनंद और ब्रज धाम की पवित्रता की महिमा साझा करती है|

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Rasik Triveni

वाणी जी