Vrindavan Ras Charcha

Rasik Saints

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श्री हित किशोरी शरण बाबाजी (सूरदास बाबा) – वृन्दावन

श्री हित किशोरीशरण बाबाजी (सूरदास बाबा) — वृन्दावन की करुणा-प्रतिमा “भैया! मेरे मन में तो ऐसी भावना उठती है कि सारा संसार सुखी हो — चाहे श्रीराधाजी मुझे ही समस्त दुख दे दें। अगर मेरा बस चले, तो समस्त जगत का दुख अपनी छाती पर धर कर मैं अकेला सह लूं!” — यह वाणी थी […]

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Siddha-Sri-Madhusudan-Das-Baba-Ji

सिद्ध श्री मधुसूदनदास बाबा जी

सिद्ध श्री मधुसूदनदास बाबा जी का जन्म बंगाल की पावन धरती पर हुआ। गाँव में जब कभी साधु-संत पधारते, तो वे उनके सत्संग एवं दर्शन हेतु श्रद्धा से पहुँच जाते। एक अवसर पर ब्रज के कुछ रसिक संतों की मंडली उनके गाँव में आई। उन संतों ने श्यामसुंदर की मधुर लीला व अपूर्व स्वरूप का

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Vrindavan ras charcha;

श्री हित रूपलाल गोस्वामी जी महाराज की दिव्य जीवनी

श्री हित रूपलाल गोस्वामी जी का जन्म श्री हित हरिवंश जी महाराज के परमपावन कुल में वैशाख कृष्ण सप्तमी, संवत 1738 (1681 ई.) को गोस्वामी श्री हित रूपलाल जी महाराज का जन्म हुआ। पिता का नाम श्री हरिलाल जी और माता श्री कृष्णकुँवरी जी था। जन्म से ही इनकी वृत्ति श्रीराधावल्लभ प्रेम में रमी हुई

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A heartfelt verse by Bhori Sakhi Ji from Prem Ki Peer, expressing the longing for Radha Rani's grace and love.

तब लगि विषयन में मन धावै। – भोरी सखी, प्रेम की पीर

तब लगि विषयन में मन धावै। जब लगि मन्द मनोहर हाँसी, हिय में नाहिं समावै।  कठिन अभाग न मिटिहै तौ लौं, प्रीति हिये नहिं आवै ॥ तासौं पुनि-पुनि गोद पसारे, आरत टेरि सुनावै।  दिल दरदीली सहज किशोरी, ‘भोरी’ भाग जगावै ॥ -भोरी सखी, प्रेम की पीर, 353 हे प्यारी जू! यह चंचल मन तब तक

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Shri Chhabiledas Ji immersed in divine devotion, surrounded by symbols of his love for Shri Rangilal Ji and Shri Radha Ji.

श्री छबीलेदास जी

श्री छबीलदास जी का जन्म देववन के एक तमोरी परिवार में हुआ, लेकिन उनके जीवन की कहानी केवल जन्म से नहीं, बल्कि उनके अनन्य प्रेम और भक्ति से लिखी गई थी। ये बाल्यकाल से ही गोस्वामी श्रीहित हरिवंशजी के अभिन्न मित्र थे। जब हरिवंशजी मात्र सात वर्ष के थे, तो उन्होंने एक कुएँ से श्री

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Shri Hariram Vyas Ji: The Rasik Saint of Vrindavan

श्री हरिराम व्यास जी की जीवनी (विशाखा सखी अवतार)

श्री हरिराम व्यास जी ओरछा (बुन्देलखण्ड) के निवासी श्रीसुमोखन जी शुक्ल के पुत्र रत्न थे। ओरछा राज्य के राजगुरु जैसे कुलीन परिवार में जन्म लेने के कारण राजा एवं प्रजा दोनों ही इनका अत्यन्त सम्मान किया करते थे। ये अपने समय के एक अद्वितीय विद्वान थे। इन्होंने शास्त्रों-पुराणों का गहन अध्ययन किया था, जिसके कारण

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