Vrindavan Ras Charcha

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श्री हित चौरासी जी – श्री हित हरिवंश गोस्वामीन विरचित

“लीला जुगल दरसि ज्यौं परी, तैसैं पद करि वरणन करी।”श्रीहित हरिवंश महाप्रभु जी ने अपने दिव्य नेत्रों से जिस प्रकार निभृत निकुंज में श्री प्रियाप्रियतम  की लीला-विलास को प्रत्यक्ष देखा, उसी रस में डूबकर उन्होंने उसे अपनी अनुपम वाणी “श्री हित चौरासी जी “ में शब्दबद्ध किया — ज्यों की त्यों। श्री हित चौरासी जी— […]

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श्री हित किशोरी शरण बाबाजी (सूरदास बाबा) – वृन्दावन

श्री हित किशोरीशरण बाबाजी (सूरदास बाबा) — वृन्दावन की करुणा-प्रतिमा “भैया! मेरे मन में तो ऐसी भावना उठती है कि सारा संसार सुखी हो — चाहे श्रीराधाजी मुझे ही समस्त दुख दे दें। अगर मेरा बस चले, तो समस्त जगत का दुख अपनी छाती पर धर कर मैं अकेला सह लूं!” — यह वाणी थी

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सिद्ध श्री मधुसूदनदास बाबा जी

सिद्ध श्री मधुसूदनदास बाबा जी का जन्म बंगाल की पावन धरती पर हुआ। गाँव में जब कभी साधु-संत पधारते, तो वे उनके सत्संग एवं दर्शन हेतु श्रद्धा से पहुँच जाते। एक अवसर पर ब्रज के कुछ रसिक संतों की मंडली उनके गाँव में आई। उन संतों ने श्यामसुंदर की मधुर लीला व अपूर्व स्वरूप का

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Vrindavan ras charcha;

श्री हित रूपलाल गोस्वामी जी महाराज की दिव्य जीवनी

श्री हित रूपलाल गोस्वामी जी का जन्म श्री हित हरिवंश जी महाराज के परमपावन कुल में वैशाख कृष्ण सप्तमी, संवत 1738 (1681 ई.) को गोस्वामी श्री हित रूपलाल जी महाराज का जन्म हुआ। पिता का नाम श्री हरिलाल जी और माता श्री कृष्णकुँवरी जी था। जन्म से ही इनकी वृत्ति श्रीराधावल्लभ प्रेम में रमी हुई

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होरी के रसिया

आज बिरज में होरी रे रसिया ।। उतते आये कुँवर कन्हैया,इतते राधा गोरी रे रसिया ।। उड़त गुलाल अबीर कुमकुमा,केशर गागर ढोरी रे रसिया ।। बाजत ताल मृदंग बांसुरी,और नगारे की जोरी रे रसिया ।। कृष्णजीवन लच्छीराम के प्रभु सौं,फगुवा लियौ भर झोरी रे रसिया ।। सजनी भागन ते फागुन आयो, मैं तो खेलूँगी श्याम

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A heartfelt verse by Bhori Sakhi Ji from Prem Ki Peer, expressing the longing for Radha Rani's grace and love.

तब लगि विषयन में मन धावै। – भोरी सखी, प्रेम की पीर

तब लगि विषयन में मन धावै। जब लगि मन्द मनोहर हाँसी, हिय में नाहिं समावै।  कठिन अभाग न मिटिहै तौ लौं, प्रीति हिये नहिं आवै ॥ तासौं पुनि-पुनि गोद पसारे, आरत टेरि सुनावै।  दिल दरदीली सहज किशोरी, ‘भोरी’ भाग जगावै ॥ -भोरी सखी, प्रेम की पीर, 353 हे प्यारी जू! यह चंचल मन तब तक

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Shri hit Mangal Gaan by Shri Hit Sevak Ji Maharaj, praising Shri Harivansh Ji and the divine virtues of Vrindavan.

श्रीहित मंगल गान

श्री हित मंगल गान जै जै श्री हरिवंश व्यास कुल मंडना। रसिक अनन्य्नी मुख्य गुरु जन भय खण्डना।। श्री वृन्दावन बास रास रस भूमि जहाँ। क्रीडत श्यामा श्याम पुलिन मंजुल तहां।। पुलिन मंजुल परम पावन त्रिविध तहां मारूत बहै। कुञ्ज भवन विचित्र शोभा मदन नित सेवत रहै।। तहाँ सन्तत व्यास नन्दन रहत कलुष विहण्डना। जै

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Shree radha chalisa shree seva kunj dham

श्री राधा चालीसा – श्री सेवा कुंज धाम

श्री राधा चालीसा – श्री सेवा कुंज धाम श्री गुरू चरण प्रताप ते, पायो विपिन को वास। वरणौं राधा चालीसा, रसिकन हिये प्रकाश।। चरण कमल हिये राखिके, जीवन होय अब धन्य। प्रिया सुयश नित गान करों, चरण सरोज अनन्य।। अहो कृपामयी लाडली, प्यारी परम उदार। वन विनोद सुखकारिणी, रसिकन प्राणाधार।। जीवन प्राण अब बन रहो,

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Vrindaban Ki Sobha Dekhe - Shri Hariram Vyas, Vyas Vani

वृंदाबन की सोभा देखे मेरे नैन सिरात।

वृंदाबन की सोभा देखे मेरे नैन सिरात। कुंज निकुंज पुंज सुख बरसत हरषत सबकौ गात॥ [1] राधा मोहनके निज मंदिर महाप्रलय नहीं जात। ब्रह्मातें उपज्यो न अखंडित कबहूँ नाहिं नसात॥ [2] फनिपर रवि तरि नहिं बिराट महँ नहिं संध्या नहिं प्रात। माया कालरहित नित नूतन सदा फूल फल पात॥ [3] निरगुन सगुन ब्रह्मतें न्यारौ बिहरत

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Bhori Sakhi Ji's "Sarvopari Mhari Maharani" - Prem Ki Peer 38

सर्वोपरि म्हारी महरानी।

सर्वोपरि म्हारी महरानी। जीत लियौ घनश्याम लाड़ली, स्ववस एक रस दानी। ललितादिक संग सखी सहचरी, वृंदावन रज धानी। ब्रह्मा विष्णु शंभु सनकादिक, महिमा नैकु न जानी। वेद पुराण सबै पचि हारे, श्री हरिवंश बखानी। भोरी ओर कृपा करि हेरौ, अलबेली ठकुरानी। – श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (38) हमारी महारानी श्री राधा रानी सर्वश्रेष्ठ

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